न्यूज़ डेस्क: दिल्ली और उसके आसपास कोयले के इस्तेमाल को रोकना जरूरी है। लेकिन उद्योग क्षेत्र सस्ता होने के कारण कोयले के इस्तेमाल पर जोर दे रहा है। क्योंकि उसका विकल्प गैस उन्हें पर लीटर के हिसाब से काफी महंगा पड़ता है। अगर राजधानी के आसपास कोयले के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगेगी तो हमें साफ हवा नहीं मिलेगी। इसके अलावा अगर लोग सार्वजनिक परिवहनों का इस्तेमाल करें तो प्रति वर्ष होने वाली वायु प्रदूषण की इस स्थिति से बचने में काफी हद तक सफलता मिलेगी।
देश में अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़, समुद्री तूफानों का कारण है जलवायु परिवर्तन
यह बात सीएसई की महानिदेशक पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने जलवायु परिवर्तन पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट द्वारा नीमली राजस्थान में एएईटीआई कैंपस में आयोजित किए गए दो दिवसीय मंथन-5 कार्यक्रम वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कही। पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आये हैं। इस वर्ष हुई रिकॉर्ड तोड़ वर्षा, सूखा, बाढ़, समुद्री तूफानों के लगातार आने और टिड्डियों के हमले से किसानों की दो-दो फसलें खत्म हुई हैं। ये सभी मुसीबतें जलवायु परिवर्तन के कारण हो रही हैं। जिसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ रहा है। भारत में गरीब मजबूर और किसानों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है।
कार्बन और मीथेन उत्सर्जन रोकने के लिए भारत को कई क्षेत्रों में काम करने की जरूरत
ग्लासगो में आयोजित हुए सीओपी26 पर उन्होंने कहा कि भारत ने 2030 तक इसमें 1 बिलियन टन उत्सर्जन कम करने की बात कही है जो अच्छी बात है। लेकिन इसके लिए भारत को औद्योगिक क्षेत्र, कृषि समेत हर क्षेत्र पर काम करना होगा। जोकि अभी भी बहुत बड़ा सवाल है। हालांकि ग्लासगो सम्मेलन से कुछ ऐसा नहीं निकला जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
सम्मेलन में जलवायु विशेषज्ञ अवंतिका गोस्वामी ने कहा कि ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण धरती के सतही तापमान में बीता दशक सबसे गर्म रहा है। हम पिछले 1 लाख 25 हजार सालों में सबसे गर्म जलवायु में हैं। कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं हुआ तो ये दशक अब तक गुजरे दशकों में सबसे गर्म होने वाला है। अब होने वाले हर अतिरिक्त 0.5 डिग्री तापमान वृद्धि से धरती और गर्म होती जाएगी। जिससे यहां सूखा और अतिवृष्टि की समस्या प्रबल हो जाएगी। उन्होंने कहा कि वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मौजूद सांद्रता 414 पार्ट्स प्रति मिलियन तक पहुंच गई है। जोकि चिंता का विषय है। जबकि इसका सामान्य स्तर 350 पार्ट्स प्रति मिलियन तक रखा गया था।
कार्यक्रम में डाउन टू अर्थ के प्रबंध निदेशक रिचर्ड महापात्रा कहा देश की गर्म होती जलवायु, पिघलते ग्लेशियर, जीका और टिड्डियों के आक्रमण पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने गांवों और जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने वाली योजनाओं पर काम करने को समय की जरूरत बताया। इस अवसर पर विवेक मिश्रा, किरण पांडेय और रजित सेनगुप्ता ने जलवायु परिवर्तन को समझने के तकनीकि पहलुओं की जानकारी दी। मंथन 5 के दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन सीएसई के वरिष्ठ निदेशक सुपर्णों बनर्जी के निर्देशन में किया गया।






