न्यूज़ डेस्क: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) प्रमुखों का कार्यकाल बढ़ाने संबंधी अध्यादेश को लेकर विपक्षी दल संसद में केंद्र सरकार को घेरने की तैयारी में हैं। अध्यादेश के मुद्दे पर पहले भी विपक्ष केंद्र की मुखालफत कर चुकी है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करने के लिए संसद की अनदेखी कर रही है और संविधान में तोड़ मरोड़ कर ‘अध्यादेश राज’ का सहारा ले रही है।
कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सवाल किया कि संसद के शीतकालीन सत्र से महज दो सप्ताह पहले सीबीआई और ईडी निदेशक का कार्यकाल बढ़ाने का अध्यादेश लाने का औचित्य क्या है? उन्होंने इसे संसद का अपमान बताया और आरोप लगाया कि वह उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश की अनदेखी करने की कोशिश कर रही है कि कार्यकाल में कोई भी विस्तार संक्षिप्त अवधि के लिए होगा और जारी जांच को बढ़ाने के लिए ‘सिर्फ दुर्लभ या अपवाद वाली परिस्थितियों में ही ऐसा किया जाएगा।
कांग्रेस मुख्यालय में सोमवार को हुई एक प्रेस कान्फ्रेंस में सिंघवी ने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा नीत सरकार विपक्ष को निशाना बनाते हुए, खुद को और अपने मित्रों को बचाने के लिए संसद को दरकिनार कर रही है तथा उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन सिर्फ जांच एजंसियों का दुरूपयोग करने के लिए कर रही है। उन्होंने कहा कि संसद सत्र के 15 दिन पहले अध्यादेश लाने का मकसद संसद को बायपास करना हुआ।
वहीं, तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा है कि विपक्षी दल भारत को एक निर्वाचित तानाशाही में तब्दील होने से रोकने के लिए अपनी पूरी कोशिश करेंगे। पार्टी ने रविवार को जारी अध्यादेशों का विरोध करते हुए राज्यसभा में सांविधिक संकल्पों के लिए दो नोटिस दिए हैं।
इन अध्यादेशों में कहा गया है कि ईडी और सीबीआई प्रमुखों का दो साल का निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के बाद केंद्र सरकार एक-एक साल कर लगातार तीन साल के लिए उनका कार्यकाल बढ़ा सकती है। वाम दलों ने अध्यादेशों को फौरन निरस्त करने की मांग की। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सोमवार को कहा कि माकपा पोलित ब्यूरो अध्यादेश लाये जाने की निंदा करता है। पार्टी ने कहा कि यह दुखद है कि इन अध्यादेशों को 29 नवम्बर से शुरू होने वाले संसद सत्र के ठीक पहले लाया गया है। भाजपा का नियमित रूप से अध्यादेश राज का सहारा लेना लोकतंत्र विरोधी है।
सीपीएम ने आरोप लगाया कि सीबीआई और ईडी, दोनों ही सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक शाखा के तौर पर काम कर रहे हैं ताकि उनके एजेंडा को आगे बढ़ाया जा सके। एक बयान में पार्टी ने कहा कि विपक्षी दलों के नेताओं को नियमित रूप से निशाना बनाया जाता है। यह कदम इन एजेंसियों को स्वायत्ता को और कम करने के लिए और मुख्य अधिकारियों को और अधिक कमजोर करने के लिए है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी कहा कि वह अध्यादेशों के खिलाफ सांविधिक संकल्प का नोटिस देने पर विचार कर रही है।







