न्यूज़ डेस्क: शनिवार को संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक के बाद बड़े ऐलान करने की तैयारियों में जुटे किसानेां ने आज दावा किया कि लंबित मांगों के संबंध में स्वीकृति के किसी भी औपचारिक वार्ता के बिना भारत सरकार उन्हें मोर्चों पर बने रहने के लिए मजबूर कर रही है, वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि उनके पास विरोध कर रहे किसानों की मौतों का कोई रिकॉर्ड नहीं है। जबकि किसान सकारात्मक कार्रवाई और उनकी जायज मांगों को पूरा किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
वहीं किसान आंदोलन के सूत्र मानते हैं कि सरकार और आंदोलनकारी संपर्क में हैं और जल्द ही बड़े ऐलान के बाद घर वापसी संभव होगी। मोर्चा नेताओं ने आज फिर दोहराया कि शहीदों के परिजनों के पुनर्वास की मांग पूरी करने के लिए सरकार का इंतजार है। दूसरी ओर राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कृषि कानून निरसन विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दी फिर एक गजट अधिसूचना भी जारी कर दी गई है और इसी के साथ एक लड़ाई औपचारिक रूप से समाप्त हो गई है।
किसानों का दावा है कि हम औपचारिक बातचीत के लिखित प्रस्ताव, एमएसपी की कमेटी पर विस्तृत प्रस्ताव के लिए वह इंतजार कर रहे हैं। हालांकि आज भी दिन भर बैठकों का दौर चलता रहा और आंदोलन के दौरान पेश आई सामस्याओं, प्रशासनिक, कानूनी पेचीदगियों पर भी किसान संगठनों ने विस्तारपूर्वक चर्चा की। इसके साथ ही शहीदों के परिजनों का समूचा रिकार्ड भी तैयार कर लिया गया है ताकि किसी भी समय सरकार की ओर से मांगे जाने पर उसे प्रस्तुत किया जा सके।
हरियाणा में एसकेएम से जुड़े किसान संगठनों ने एक बैठक की और एसकेएम की छह लंबित मांगों को दोहराने के अलावा, बताया कि हरियाणा सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुन:स्थापन अधिनियम 2013 (एलएआरआर 2013) में राज्य स्तर के संशोधनों को निरस्त किया जाना है। उन्होंने राज्य सरकार से यह भी मांग की कि वह राज्य में किसानों के विरोध को रोकने के लिए पारित एक अलोकतांत्रिक कानून हरियाणा लोक व्यवस्था में गड़बड़ी के दौरान संपत्ति के नुकसान की वसूली अधिनियम, 2021 को वापस ले।







